पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक चर्चा लगातार तेज़ हुई है—Dedollarization।
कहा जा रहा है कि दुनिया धीरे-धीरे अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रही है और वैकल्पिक मुद्राओं की ओर बढ़ रही है।
BRICS देशों की पहल, भारत द्वारा रुपये में व्यापार, और कुछ देशों पर लगे प्रतिबंधों ने इस बहस को और गहरा किया है।
लेकिन सवाल यह है—क्या वाकई डॉलर का प्रभुत्व खत्म हो रहा है, या यह सिर्फ एक अधूरी तस्वीर है? इस लेख में हम तथ्यों और आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सच्चाई को समझेंगे।
Dedollarization का मतलब क्या है?
Dedollarization का अर्थ है वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर की भूमिका को धीरे-धीरे कम करना और उसकी जगह स्थानीय या वैकल्पिक मुद्राओं का उपयोग बढ़ाना।
आसान शब्द में कहा जय तो Dedollarization से तात्पर्य यह है की दुनिया का अमेरिकी प्रभाव से धीरे-धीरे मुक्त होना।
इसका उद्देश्य क्या है?
डॉलर की अस्थिरता से बचाव,अमेरिकी प्रतिबंधों (Sanctions) के जोखिम को कम करना,घरेलू मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत करना।
अमेरिका का कर्ज़ की खतरनाक स्थिति के कारण, देशों द्वाराअपनी ट्रेज़री में फॉरेन रिजर्व करेंसी से डॉलर की होल्डिंग कम करना, अमेरिकी प्रतिबंधों से बचाव रिजर्व मुद्रा से हट कर अपनी मुद्रा में व्यापार इसका उद्देश्य है।
डॉलर इतना प्रभावशाली क्यों रहा? (Global Dominance Explained)
डॉलर पिछले लगभग 60 वर्षों से वैश्विक वित्तीय प्रणाली की धुरी रहा है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:
1. विदेशी मुद्रा भंडार (Reserves)
संसार के अधिकतम देशों द्वारा अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की मात्रा अधिक रखना इसका एक प्रमुख कारण है।
IMF के COFER डेटा के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 61% हिस्सा अभी भी डॉलर में है।
कारण क्या था ?
2. विदेशी मुद्रा व्यापार (FX Trading)
BIS की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक FX मार्केट के कुल टर्नओवर में डॉलर लगभग 44% हिस्सेदारी रखता है।
3. व्यापार इनवॉइसिंग
दुनिया के करीब 54% अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बिलिंग डॉलर में होती है, भले ही व्यापार अमेरिका से न जुड़ा हो।
यही कारण है कि डॉलर को आसानी से हटाना व्यावहारिक रूप से बहुत कठिन है।
क्या सच में डॉलर से दूर जाने का ट्रेंड है?
हाँ, लेकिन बहुत धीमी गति से, IMF और BIS दोनों ही यह मानते हैं कि रिज़र्व मुद्राओं में बदलाव बेहद धीरे होता है।
डॉलर की रिजर्व करेंसी का स्टेटस जाएगा, परंतु एकदम से नहीं। होना भी यही चाहिए, वरना सारे सिस्टम कोलैप्स हो जाएंगे जो प्रेक्टिकल बिल्कुल भी नहीं है।
पाउंड से डॉलर की जगह लेने में भी कई दशक लगे थे, डॉलर का inertia effect आज भी मज़बूत है।
उदाहरण:
2018 के बाद कुछ देशों (जैसे रूस) ने अपने रिज़र्व में डॉलर की हिस्सेदारी कम की, लेकिन यह भूराजनीतिक दबाव का परिणाम था, न कि वैश्विक नियम।
BRICS और भारत का दृष्टिकोण (INR Settlement & SRVA)
INR Settlement Mechanism
भारत ने द्विपक्षीय व्यापार को स्थानीय मुद्रा (रुपया) में निपटाने के लिए एक नया ढांचा अपनाया है।
SRVA (Special Rupee Vostro Account):
Reserve Bank of India द्वारा शुरू की गई यह व्यवस्था विदेशी बैंकों को भारत में रुपये में खाता खोलने की अनुमति देती है।
अर्थात जिस प्रकार किसी बैंक में कोई व्यक्ति अपना खाता खोलता है ठीक उसी प्रकार किसी विदेशी बैंक द्वारा किसी भारतीय बैंक में खाता खोलना।
इसके फायदे:
Exporters को exchange rate risk कम:
डॉलर as a third party करेंसी न होने के कारण एक्सचेंज रेट्स के रिस्क से सुरक्षित
Dollar की जरूरत घटती है:
Transaction cost कम होती है:
RBI खुद स्पष्ट करता है कि यह व्यवस्था डॉलर का विकल्प नहीं, बल्कि एक complementary system है।
Myth vs Fact (6 जरूरी बिंदु)
Myth 1:
डॉलर जल्द खत्म होने वाला है
Fact:
डॉलर की हिस्सेदारी आज भी सबसे अधिक है और बदलाव बहुत धीमा है, कम से कम चार या पांच वर्ष लग सकते हैं।
Myth 2:
BRICS तुरंत नई मुद्रा ला देगा
Fact:
BRICS में साझा मुद्रा पर सहमति अभी प्रारंभिक चरण में है ।
हो सकत है नई व्यवस्था में रिजर्व मुद्रा की कोई जरूरत ही न पड़े।
Myth 3:
व्यापार ही रिज़र्व तय करता है
Fact:
वित्तीय बाज़ार, कर्ज और सुरक्षा भी अहम भूमिका निभाते हैं
Myth 4:
Dedollarization सिर्फ आर्थिक फैसला है
Fact:
इसमें भू-राजनीति और प्रतिबंधों की बड़ी भूमिका है
Myth 5:
सभी देश डॉलर छोड़ना चाहते हैं?
Fact:
अधिकतर देश संतुलन चाहते हैं, टकराव नहीं
Myth 6:
इससे वैश्विक अस्थिरता खत्म होगी
Fact:
गलत क्रियान्वयन से अस्थिरता बढ़ भी सकती है
भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?
1. व्यापार और निर्यात
स्थानीय मुद्रा में व्यापार से भारतीय निर्यातक ज़्यादा प्रतिस्पर्धी कीमतें तय कर सकते हैं।
2. आयात सुरक्षा
डॉलर संकट के समय आयात भुगतान में लचीलापन मिलता है।
3. रिज़र्व प्रबंधन
रुपये में निपटान से विदेशी मुद्रा रिज़र्व पर दबाव कम होता है।
4. रुपये की वैश्विक पहचान
धीरे-धीरे रुपये की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ती है।
निष्कर्ष:
असली तस्वीर क्या कहती है?Dedollarization कोई अचानक होने वाली क्रांति नहीं है, बल्कि धीमी और सीमित प्रक्रिया है।
डॉलर आज भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली का केंद्र है, लेकिन देश अपने जोखिम कम करने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं।
भारत की नीति संतुलित है—डॉलर को चुनौती नहीं, बल्कि विकल्प तैयार करना। यही व्यावहारिक और सुरक्षित दृष्टिकोण है।
आप से सवाल
आप क्या सोचते हैं ?क्या आने वाले 4 से 5 वर्षों में रुपये जैसी मुद्राएँ वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभा पाएँगी, या डॉलर का दबदबा बना रहेगा? या रिजर्व करेंसी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताइए।
Official Research Source Links
1. RBI – INR Trade Settlement (PDF)
2. IMF – COFER Data (Reserves)
5. BIS – Annual Economic Report

0 टिप्पणियाँ