डॉलराइजेशन क्या था?
शुरूआत करते है ब्रिटेनब्रिटेन द्वारा वैश्विक कॉलेनाइजेशन के दौर से। ब्रिटेन द्वारा विश्व के अत्यधिक जगहों पर शासन स्थापित था। ब्रिटेन के पास इन कॉलोनिज देशों से तमाम आर्थिक लाभ मिलता रहा। एक कहावत है अति का भला न बोलना अति की भला न चुप, अति की भला ना बरसाना अति की भला न धूप। अर्थात अति हर चीज़ की हानिकारक होती है। धन की अति ब्रिटेन की जनता को सुविधा भोगी बना दिया। उनका खर्चा बढ़ा।
अतः जो मार्केट फोर्स जिनके दम पर ब्रिटेन एक शक्तिशाली देश बना अब उसकी छत्ती होना शुरु हुआ। यूरोप के आपसी लड़ाई वजह बनी पहले और दूसरे विश्वयुद्ध का। इन युद्धों के कारण यूरोप के शक्ति क्षीण हुई। इन्हीं के बीच एक शक्तिशाली देश अमेरिका उभरा। अमेरिका ने युद्ध में खूब धन कमाया। कुछ समय के बाद जब पेट्रोल नामक रसायन की खोज हुई और पेट्रोल एक महत्वपूर्ण तत्व बना ऊर्जा का। आर्थिक उन्नति पैट्रोल पर निर्भर होगई।
तब अमेरिका ने खाड़ी देशों के साथ मिलकर अपनी मुद्रा डालर को पेट्रोल के साथ जोड़ कर अपनी मुद्रा को विश्व आर्थिक संचालन का एक महत्वपूर्ण टूल बना दिया यही डॉलराइजेशन है।
डॉलराइजेशन को स्थापित करने के लिए क्या क्या किया गया?
डॉलर को महत्वपूर्ण बनाने के लिए पेट्रोल को डॉलर के साथ जोड़ा गया जिससे दुनिया के अत्यधिक देश डॉलर में व्यापार करने लगे। साथ ही डॉलर एक महत्वपूर्ण मुद्रा होने के कारण देश अपने रिजर्व में डॉलर की मात्रा रखने लगे।इस से यह हुआ की डॉलर का मुद्रण सोने के रिजर्व जरूरतों पर निर्भरता समाप्त हो गई। इस से पहले मुद्रा का प्रिंटिंग सोने के रिजर्व की मात्रा पर ही निर्भर रहता था। अब अमेरिका असीमित डॉलर की मुद्रण कर सकता था।
इस बादशाहत को बनाए रखने के लिए हर देशों के आस पास एक दुश्मन देश स्थापित किया गया। जैसे चीन के पास ताईवान, भारत के पास पाकिस्तान, रूस के पास यूक्रेन, इजरायल का ईरान। इसमें एक देश को मुद्रा तथा एक देश को हाथियार दिया जाता था ताकि दुश्मनी फलती फूलती रहे। साथ ही देस के अंदर डॉलर के फंडिंग से मुस्लिम कट्टरपंथ बढ़ाया गया ताकी देश आंतरिक मामलों में ही उलझा रहे।
साथ ही वैश्विक व्यापार पर पकड़ बनाए रखने के लिए कई तरह के अंतर्राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किया गया जैसे वार्ड बैंक, यूएनओ, आदि आदि।वार्ड बैंक में जो भी देश आर्थिक उन्नति के लिए जाता था तो उससे कई तरह के शर्तों के साथ मुद्रा दिया जाता था। देशों के पास इसकी कोई दूसरा साधन नहीं था क्योंकि वैश्विक सिस्टम का संचालन यही संस्थान करते थे।
इस से पश्चिमी देश उपभोक्ता और एशिया देश स्पेशली चीन उत्पादक देश बना। चीन ने रात दिन मेहनत किया श्रमिक का शोषण किया प्रोडक्ट बनाया अपनी भौतिक संपदा का दोहन किया और पश्चिमी देश डॉलर के प्रिटिंग किया मजे किया और कागज की करेंसी देकर असली सामान को राक्षसी रूप में उपयोग किया। यहां राक्षसी शब्द का अर्थ है जरूरत से कई गुना उपयोग।
डिडोलराइजेशन क्या है?
डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संचालन में उपयोगिता की संपत्ति ही डेडोलराइजेशन है। अगर यह पूछा जय की कौन कर रहा है डिदॉलराइजेशन तो उत्तर होगा bircs देश जैसे भारत,चीन, रूस, साउथ अफ्रीका इत्यादि साथ ही अमेरिका की वैश्विक मार्केट फ़ोर्स भी सामिल है इस डीडोलराइजेशन में
अगर brics अर्थात ब्राजील, रूस इंडिया चाइना की जगह urics अर्थात usa, रूस, इंडिया चाइना साउथ अफ्रीका को कारण कहा जाय डेडोलेराइजेशन का तो गलत नहीं होगा। खुद अमेरिका राजी है इस dedolleriztion में।
कारण क्या है डीडॉलराइजेशन का?
प्रथम कारण अति उपभोक्ता। पश्चिमी देशों के लोगों का ज़रूरत से ज्यादा वस्तुओं का उपभोग और बर्बादी तथा कार्यक्षमता की गिरावट प्रथम कारण है। दूसरा चीन और एशियाई देशों को यह समझ आना की ये अपने श्रमिक को अब्यूज कर रहे हैं अपने वातावरण को दूषित कर रहे हैं और अमेरिका केवल करेंसी छाप कर हमारे वास्तविक प्रोडक्ट खरीद रहे हैं। यह बात चीन को करोना के दौरान पता चली जब अमेरिका ने एक ही झटके में 3ट्रिलियन डॉलर की छपाई कर दी इतने पैसे इक्ट्ठा करने में चीन को सालों लगे
तीसरा कारण है पश्चिम देशों का घटती जनसंख्या तथा unskilled जनसंख्या।चौथा कारण है डॉलर का हथियारीकरण अमेरिका द्वार डालर से सैक्शन लगाना तथा रूश का पैसे का फ्रिज करना
पांचवा कारण अमेरिका के मार्केट फोर्स को अब डॉलर जैसे टूल की केई आवश्यकता नहीं रही साथ ही पेट्रोल की उपयोगिता भी कुछ ही समय तक रहने वाली है।
क्या होगा डेडोलराइजेशन के बाद?
डॉलर के शक्ति के बल पर जितनी भी संस्थान खड़े किए गए उनका क्षरण, या खत्मा या रिफॉर्म। डॉलर द्वारा स्थापित नगरों का क्षरण तथा नए नगरों का निर्माण । डॉलर के दम पर जीतने व्यापारिक क्षेत्रों का मूल्य बढ़ाया गया उसका क्षरण तथा पुराने क्षेत्रों का मूल्य का बढ़ाना। नए शक्ति केंदों की स्थापना।
उदाहरण के तौर पर वार्ड बैंक, यूएनओ जैसे संस्थान का समाप्ति या रिफॉर्म,। डॉलर से स्थापित न्यूयॉर्क, सिलिकॉन वैली जैसे नगर का क्षरण टेक्सास, गिफ्ट सिटी सूरत, मास्को, संघई जैसे शहर शक्ति के केंद्र बनेंगे। जिसमे गिफ्ट सिटी की शक्ति सबसे ज्यादा होने वाली है।
डॉलर के दम पर जो it सेक्टर की वैल्यूएशन बढ़ाई गई थी वो घाटेगी कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस लाजिस्टिक, एयरो स्पेस जैसे सेक्टर के वैल्युएशन बढ़ेगी।
संक्षेप
वैश्विक व्यवस्था में अमूल चामुल परिवर्तन असंभवी है। विश्व यूनिपोलर से मल्टीपोलर की तरफ जा रहा है। जिसके प्रमुख देश भारत, चीन ऋष अमेरिका होंगे। सिस्टम में बदलाव पुरानी व्यवस्था का गिरना नई व्यवस्था का उदय निश्चित है।
लेखक
प्रभु नाथ
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