भू-आर्थिक टकराव 2026? क्या सही क्या गलत

 सर्व प्रथम हमे ये ध्यान देना है कि विश्व में हर चीज़ इकोनॉमी से जुड़ी हुई है। बिना आर्थिक हीत के विश्व में कोई भी बड़ी घटनाएं नहीं होती।अगर हम सामान्य व्यवहार में रिश्तों को देखें चाहे परिवारिक या सामाजिक हर एक रिश्ता आर्थिक व्यवहार पर टीका है। नीतियां,आदर्श, व्यवहार ये तत्व रिश्तों को सुचार रूप से संचालित करने के लिए होते हैं। अब हम अपने मुख्य विषय सामग्री पर चलते हैं। जिसका आधार उपरोक्त कथन है।

भू टकराव 2026


1. भू-आर्थिक टकराव क्या है? (What is Geo-economic Confrontation?)

भू-आर्थिक टकराव का अर्थ है राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आर्थिक साधनों का उपयोग करना। इसमें शामिल हैं:

व्यापार युद्ध (Trade Wars): आयात शुल्क (Tariffs) बढ़ाना।

प्रतिबंध (Sanctions): किसी देश की बैंकिंग प्रणाली या निर्यात को रोकना।

आपूर्ति श्रृंखला का हथियारकरण (Weaponization of Supply Chains): कच्चे माल या चिप्स (Semiconductors) की आपूर्ति बंद करना।

2. वैश्विक तनाव के प्रमुख कारण

वैश्विक अर्थव्यवस्था अब दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं:

क. तकनीकी राष्ट्रवाद (Tech-Nationalism)

5G, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर निर्माण में प्रभुत्व जमाने की होड़ ने देशों के बीच दीवारें खड़ी कर दी हैं। अब तकनीक केवल सुविधा नहीं, बल्कि सामरिक शक्ति है।

ख. ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा

रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व के तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा (Gas/Oil) की आपूर्ति को कभी भी राजनीतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

ग. डॉलर का विकल्प तलाशना (De-dollarization)

कई देश अब अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं और स्थानीय मुद्राओं (जैसे रुपया, युआन, रूबल) में व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे वैश्विक वित्तीय ढांचे में टकराव बढ़ रहा है।

3. भारत पर इसका प्रभाव और रणनीतिक अवसर

भारत इस भू-आर्थिक बिसात पर एक 'बैलेंसिंग पावर' के रूप में उभरा है।

चीन+1 रणनीति: वैश्विक कंपनियां अब चीन से हटकर भारत को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में देख रही हैं।

आत्मनिर्भर भारत: रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन बढ़ाकर भारत बाहरी झटकों से खुद को सुरक्षित कर रहा है।

बहुपक्षीय मंच: भारत G20, SCO और BRICS जैसे मंचों का उपयोग करके एक न्यायसंगत वैश्विक व्यापार व्यवस्था की वकालत कर रहा है।

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4. भविष्य की राह: टकराव से सहयोग की ओर

यदि भू-आर्थिक टकराव इसी तरह बढ़ता रहा, तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (Global GDP) में भारी गिरावट आ सकती है। समाधान के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

बहुपक्षवाद का पुनरुद्धार: WTO जैसी संस्थाओं को मजबूत करना।

डिजिटल व्यापार नियम: डेटा और ई-कॉमर्स पर वैश्विक सहमति।

लचीली आपूर्ति श्रृंखला: आपूर्ति के लिए केवल एक देश पर निर्भर न रहना।

निष्कर्ष

भू-आर्थिक टकराव 21वीं सदी की नई वास्तविकता है। यह न केवल देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ाता है, बल्कि विकासशील देशों के लिए विकास की नई चुनौतियाँ भी पेश करता है। आने वाले समय में वही राष्ट्र सफल होंगे जो आर्थिक मजबूती के साथ-साथ कूटनीतिक लचीलापन भी बनाए रखेंगे।

लेखक 

प्रभु नाथ 

एक स्वतंत्र विश्लेषक 

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