📌 डेटा स्निपेट: भू-राजनीति में भारत की “Core Priorities”
Geo-politics
श्रेणी
भारत का फोकस
क्यों महत्वपूर्ण?
सीमाई सुरक्षा
LAC/LOC, पड़ोसी स्थिरता
राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जोखिम प्रबंधन
समुद्री रणनीति
हिंद महासागर, मुक्त नौवहन
ट्रेड रूट और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा
आर्थिक भू-राजनीति
Trade, Supply Chain, निवेश
विकास, नौकरियाँ, रणनीतिक निर्भरता घटाना
तकनीक/डिजिटल शक्ति
DPI, साइबर, AI governance
भविष्य की शक्ति—डेटा, टेक और सुरक्षा
रणनीतिक स्वायत्तता
सभी से साझेदारी, किसी का पिछलग्गू नहीं
मल्टीपोलर सिस्टम में भारत का संतुलन
भू राजनीति क्या है?भू राजनीति और भारत।
| श्रेणी | भारत का फोकस | क्यों महत्वपूर्ण? |
|---|---|---|
| सीमाई सुरक्षा | LAC/LOC, पड़ोसी स्थिरता | राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जोखिम प्रबंधन |
| समुद्री रणनीति | हिंद महासागर, मुक्त नौवहन | ट्रेड रूट और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा |
| आर्थिक भू-राजनीति | Trade, Supply Chain, निवेश | विकास, नौकरियाँ, रणनीतिक निर्भरता घटाना |
| तकनीक/डिजिटल शक्ति | DPI, साइबर, AI governance | भविष्य की शक्ति—डेटा, टेक और सुरक्षा |
| रणनीतिक स्वायत्तता | सभी से साझेदारी, किसी का पिछलग्गू नहीं | मल्टीपोलर सिस्टम में भारत का संतुलन |
भूअर्थात धरती राजनीति अर्थात राज करने की नीति, भू राजनीति का तात्पर्य है सम्पूर्ण धरती की राजनीति। भू राजनीति कोई विषयों का समावेश है जैसे भू अर्थशास्त्र भूगोल,भू इतिहास।
जब हम भू राजनीति के बारे मे बात करते हैं तो उसमें अर्थव्यवस्था जो प्रमुख तत्व हैं, राष्ट्रीय सीमाएं, राष्ट्रीय इतिहास की चर्चा किए बिना यह विषय अधूरा ही रहेगा इस विषय के अंतर्गत आने वाले पॉइंट्स में, ट्रेड सप्लाई चैन,सीमा विवाद, युद्ध, व्यापारिक व्यवस्था आदि आते हैं।
यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन तनाव, मध्य पूर्व संकट या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा—इन सभी घटनाओं को केवल खबरों के रूप में नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।
भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति के लिए भू-राजनीति केवल विदेश नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और भविष्य से जुड़ा विषय है।
सर्व प्रथम इतिहास में चलते हैं और पुरानी भू व्यवस्था कपर चर्चा करते हैं उसके बाद हम आज की वर्तमान व्यवस्था पर विचार विमर्श करेंगे। आज की व्यवस्था पर आने से पहले हमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय और उसके बादकी व्यवस्था पर विचार करना होगा।
द्वितीय विश्व युद्ध और उसके पहले का काल खण्ड
इतिहास में झांकना प्रारम्भ करते हैं सन् 1600 मे ब्रिटेन नामक राष्ट्र एक शक्ति के रूप में उभर रहा था। उस काल खंड में राजशाही की शासन व्यवस्था थी। परन्तु उस काल खण्ड में ब्रिटेन में कैप्टलाइजेशन की शुरुआत हो चुकी थी।
अन्य राष्ट्र समाजवादी व्यवस्था का पालन करते थे।समाजजवादी व्यस्था और कैपिटलाइजेशन में अंतर इतना ही है की समाजवादी व्यवस्था में वित्तीय श्रोतों का वितरण जनता के हाथों में होता है।
जबकि कैप्टलाइजेशन में वित्तीय व्यवस्था कुछ संस्थान के हाथों में होती है।हालांकि ब्रिटेन में उस समय पूरी तरह कैप्टलाइजेशन नहीं था परंतु कंपनी नामक संस्थान की शुरुआत हो चुकी थी।
कंपनी नामक संस्थान स्थापित होने के कारण वस्तुओं का निर्माण बहुत ही अत्यधिक मात्रा में होता था। जिसको बेच कर ब्रिटेन राष्ट्र सम्पन्नता की तरफ अग्रसरित होने लगा।
हालांकि धन का कंट्रोल कुछ व्यक्ति के पास ही था। परंतु राजव्यवस्था भी अमीर होती रही। ब्रिटेन की राज्य व्यवस्था और कम्पनी के सहयोग से ब्रिटेन उपनिवेश स्थापित करता गया।
उपनिवेशों के लूट धन से ब्रिटेन आर्थिक और सैन्य रूप में वर्तमान समय में सबसे शक्तिशाली राष्ट्र था परंतु साथ के यूरोपीय राष्ट्र भी उन्नति कर रहे थे। क्योंकि साथ के राष्ट्र में भी captliztion और उपनिवेश थे।
सन् 1900 के काल खंड वह समय है जब यूरोपीय देशों के आपस में संघर्ष की शुरुआत हो चुकी थी। साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था और पूर्ण कैपिटलाइजेशन व्यवस्था की शुरुआत हो गई थी।
आपसी संघर्ष ने विश्व युद्ध के रूप ले लिया जिसमें जिस देश के जो उपनिवेश था उस देश के पक्ष में युद्ध किया।
प्रथम विश्व युद्ध ने ब्रिटेन को एक सुपर पावर के रूप मे स्थापित किया परंतु द्वितीय विश्व युद्ध के समय तक ब्रिटेन की सैन्य खर्च उसके जीडीपी से ज्यादा हो चुकी थी। जिसमें कैप्टलाइजेशन व्यवस्था को सर्वाइव करना कठिन हो गया।
अतः द्वितीय विश्व युद्ध के काल खंड में कैप्टलिस्ट द्वारा अमेरिका नामक राष्ट्र शक्ति का केंद्र बना। और ब्रिटेन की सुपर पवार का स्टेट्स जाता रहा।
यह गौर करने वाला तथ्य है कि देस सुपर पवार नहीं है बल्कि उन पुराने कैप्टलिस्ट घराने है जो उपनिवेशवाद के समय में अत्यन्त शक्तिशाली हो गए थे के द्वारा समय समय पर एक नए राष्ट्र को शक्तिशाली बनाया जाता है।

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