भू राजनीति क्या है? भू राजनीति और भारत।
भूअर्थात धरती राजनीति अर्थात राज करने की नीति, भू राजनीति का तात्पर्य है सम्पूर्ण धरती की राजनीति। भू राजनीति कोई विषयों का समावेश है जैसे भू अर्थशास्त्र भूगोल,भू इतिहास।
जब हम भू राजनीति के बारे मे बात करते हैं तो उसमें अर्थव्यवस्था जो प्रमुख तत्व हैं, राष्ट्रीय सीमाएं, राष्ट्रीय इतिहास की चर्चा किए बिना यह विषय अधूरा ही रहेगा इस विषय के अंतर्गत आने वाले पॉइंट्स में, ट्रेड सप्लाई चैन,सीमा विवाद, युद्ध, व्यापारिक व्यवस्था आदि आते हैं।
यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन तनाव, मध्य पूर्व संकट या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा—इन सभी घटनाओं को केवल खबरों के रूप में नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।
भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति के लिए भू-राजनीति केवल विदेश नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और भविष्य से जुड़ा विषय है।
सर्व प्रथम इतिहास में चलते हैं और पुरानी भू व्यवस्था कपर चर्चा करते हैं उसके बाद हम आज की वर्तमान व्यवस्था पर विचार विमर्श करेंगे। आज की व्यवस्था पर आने से पहले हमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय और उसके बादकी व्यवस्था पर विचार करना होगा।
द्वितीय विश्व युद्ध और उसके पहले का काल खण्ड
इतिहास में झांकना प्रारम्भ करते हैं सन् 1600 मे ब्रिटेन नामक राष्ट्र एक शक्ति के रूप में उभर रहा था। उस काल खंड में राजशाही की शासन व्यवस्था थी। परन्तु उस काल खण्ड में ब्रिटेन में कैप्टलाइजेशन की शुरुआत हो चुकी थी।
अन्य राष्ट्र समाजवादी व्यवस्था का पालन करते थे।समाजजवादी व्यस्था और कैपिटलाइजेशन में अंतर इतना ही है की समाजवादी व्यवस्था में वित्तीय श्रोतों का वितरण जनता के हाथों में होता है।
जबकि कैप्टलाइजेशन में वित्तीय व्यवस्था कुछ संस्थान के हाथों में होती है।हालांकि ब्रिटेन में उस समय पूरी तरह कैप्टलाइजेशन नहीं था परंतु कंपनी नामक संस्थान की शुरुआत हो चुकी थी।
कंपनी नामक संस्थान स्थापित होने के कारण वस्तुओं का निर्माण बहुत ही अत्यधिक मात्रा में होता था। जिसको बेच कर ब्रिटेन राष्ट्र सम्पन्नता की तरफ अग्रसरित होने लगा।
हालांकि धन का कंट्रोल कुछ व्यक्ति के पास ही था। परंतु राजव्यवस्था भी अमीर होती रही। ब्रिटेन की राज्य व्यवस्था और कम्पनी के सहयोग से ब्रिटेन उपनिवेश स्थापित करता गया।
उपनिवेशों के लूट धन से ब्रिटेन आर्थिक और सैन्य रूप में वर्तमान समय में सबसे शक्तिशाली राष्ट्र था परंतु साथ के यूरोपीय राष्ट्र भी उन्नति कर रहे थे। क्योंकि साथ के राष्ट्र में भी captliztion और उपनिवेश थे।
सन् 1900 के काल खंड वह समय है जब यूरोपीय देशों के आपस में संघर्ष की शुरुआत हो चुकी थी। साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था और पूर्ण कैपिटलाइजेशन व्यवस्था की शुरुआत हो गई थी।
आपसी संघर्ष ने विश्व युद्ध के रूप ले लिया जिसमें जिस देश के जो उपनिवेश था उस देश के पक्ष में युद्ध किया।
प्रथम विश्व युद्ध ने ब्रिटेन को एक सुपर पावर के रूप मे स्थापित किया परंतु द्वितीय विश्व युद्ध के समय तक ब्रिटेन की सैन्य खर्च उसके जीडीपी से ज्यादा हो चुकी थी। जिसमें कैप्टलाइजेशन व्यवस्था को सर्वाइव करना कठिन हो गया।
अतः द्वितीय विश्व युद्ध के काल खंड में कैप्टलिस्ट द्वारा अमेरिका नामक राष्ट्र शक्ति का केंद्र बना। और ब्रिटेन की सुपर पवार का स्टेट्स जाता रहा।
यह गौर करने वाला तथ्य है कि देस सुपर पवार नहीं है बल्कि उन पुराने कैप्टलिस्ट घराने है जो उपनिवेशवाद के समय में अत्यन्त शक्तिशाली हो गए थे के द्वारा समय समय पर एक नए राष्ट्र को शक्तिशाली बनाया जाता है।
शीत युद्ध से बहुध्रुवीय विश्व तक
द्वितीय विश्व युद्ध के पक्षात
यूरोपी देशों के शक्ति क्षीण हुई तथा दो देश शक्तिशाली बन के उभरे जिसमें अमेरिका और रूस थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी स्थिरता नहीं आई और अमेरिका तथा रुस एकल शक्ति बनाने के लिए संघर्ष करने लगे।
जिसका नाम शीत युद्ध रखा गया, शीत युद्ध का तात्पर्य यह है कि सैन्य कार्रवाई न करके इकनॉमी और डिप्लोमेसी के जरिए कंट्रोल
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चुकी संसार के अधिक देश पश्चिमी देशों के इनफ्लुएंस में था और उस समय वैश्विक संस्थान जैसे un, IMF आदि का निर्माण हो चुका था के कारण अमेरिका युद्ध में विजई हुआ।
शीत युद्ध के बादअमेरिका एकमात्र सुपरपावर बन चुका था और यूनिपोलर वार्ड की शुरुआत हो गई थी।
यूनिपोलर वार्ड बनाए रखने के लिए प्रयोग किया गया टूल
अमेरिका की शक्ति स्थापित होने के बाद उस शक्ति को जारी रखने के लिए कई तरह के टूल का इस्तेमाल किया गया जैसे। WTO
WORD TRED ORGNIGETION जो उत्तर दाई था वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार के लिए।
IMF और WORD बैंक जो उत्तरदाई था विकास के लिए फंड प्रोवाइड करना। UN जो उत्तरदाई था शांति स्थापित करने के लिए।यह सारी संस्थान केवल एक टूल था व्यवस्था पर कंट्रोल हेतु।
वर्तमान युग
कोविड के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ ही अमेरिकन एकध्रुवी शक्ति केंद्र का अंत के संकेत भी मिलने लगे जो आज के समय में बहुत ही स्पष्ट दिखाई देने लगे है।आज की दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) बन रही है। इस मल्टीपोलर शक्ति केंद में जो शक्तियां नेतृत्व करेंगी वह है।
भारत
रूस
चीन
और अमेरिका
जो अपने अपने क्षेत्र में इनफ्लुएंस करेंगी अमेरिका का ग्रीनलैंड पर दावा, वेंज्याला प्रकरण, कनाडा को अमेरिकन स्टेट के रूप में दावा।चीन का ताइवान पर दावा, भारत का पीओके पर दावा इस बात के साफ संकेत है।
आधुनिक भू-राजनीति के मुख्य तत्व
1. शक्ति (Power)
अ.सैन्य शक्ति
ब.आर्थिक शक्ति
स.तकनीकी शक्ति
द.कूटनीतिक प्रभाव
2 संसाधन (Resources)
अ.तेल और गैस
ब. दुर्लभ खनिज
स.जल संसाधन
द.डेटा और टेक्नोलॉजी
3. भूगोल (Geography)
समुद्री मार्ग
सीमा विवाद
पर्वत, रेगिस्तान, समुद्र
भारत एक भू-राजनीति का एक उभरती शक्ति
भारत की भोगौलिक स्थिति उसे स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। साथ ही पुरातन सांस्कृतिक ज्ञान स्किल्ड जनसंख्या भारत को एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करने में योगदान प्रदान करती है।
भारत की ताकत
रणनीतिक स्थान:
भारत की भौगोलिक स्थिति जिसमे एक तरफ अरब सागर और दूसरी तरफ बंगाल की खड़ी एक बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान प्रदान करती है साथ ही हिमालय भारत को एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता है।
युवा जनसंख्या :
स्किल पूर्ण युवा जनसंख्या जियो पॉलिटिक्स में भारत को एक सशक्त देश का स्वरूप देता है
मजबूत लोकतंत्र:
भारत का लोकतंत्र का इतिहास बहुत प्राचीन है। अगर द्वापर युग मे जाएं तो कृष्ण के पलक पिता नंद भी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुने हुए प्रमुख थे। आज के समय में भी भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुत ही मजबूत है।
बढ़ती अर्थव्यवस्था:
वर्तमान अर्थव्यवस्था में भारत सबसे स्टेबल और सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। जिस के कारण वर्तमान में भारत भू राजनीति का केंद्र है।
भारत की रणनीति
रणनीतिक स्वायत्तता:
भारत की ज्योपोल्टिकल स्टैंड है की वह किसी भी गुट या देश का पिछलग्गू नहीं है। उसका एजेंडा स्वायत और स्वतंत्र है।
सभी से मित्रता, किसी पर निर्भरता नहीं:
दूसरा स्टैंड यह है कि वह किसी भी गुट का समर्थक या विरोधी नहीं है। सभी से मित्रता और किसी पर निर्भरता नहीं यही भारत की रणनीति है।
भारत की विदेश नीति के मुख्य स्तंभ
1. पड़ोसी पहले नीति:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रारंभ से ही पड़ोसी पहले नीति रही है। यह निति नई मल्टीपोलर व्यवस्था में हित करी होगा जब नई शक्तियां अपने अपने क्षेत्र की नीतियां निर्धारित करेंगी
2.एक्ट ईस्ट पॉलिसी;
प्रधानमंत्री का पड़ोसी पहले नीति की तरह एक्ट ईस्ट पॉलिसी भी महत्वपूर्ण है जिसके तहत भारत का नीति में पूर्व के देशों को तवजो देना है।
3. इंडिया पेसिफिक विजन :
उपरोक्त पॉलिसी की तरह यह भी एक महत्वपूर्ण पॉलिसी है। जिसके बारे मे चर्चा हम नेक्सट आर्टिकल में करेंगे
4.ग्लोबल साउथ का नेतृत्व:
यह भी भारत का एक महत्वपूर्ण विदेशी नीति है जिसकी चर्चा विस्तृत की जाएगी।
भारत के लिए भू-राजनीति क्यों जरूरी है?
राष्ट्रीय सुरक्षा:
किसी भी देश के लिए भू राजनीति बहुत जरूरी होता हैं यह सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ मामला है। यह आज का नहीं यह प्राचीन काल से ही जरूरी रहा है।
ऊर्जा सुरक्षा
आज का आधुनिक काल में ऊर्जा विकास का प्रमुख स्तंभ है बिना ऊर्जा के कोई देश विकसित नहीं हो सकता, ऊर्जा सीधे भूराजनीतिक के अन्तर्गत आती हैं अतः भारत ऊर्जा के लिए भू राजनीत पर नज़र रखना जरूरी है।
1आर्थिक विकास, 2वैश्विक प्रतिष्ठा ,3तकनीकी आत्मनिर्भरता
भी कारण है भारत को भू राजनीति पर पकड़ बनाए रखने के लिए।
भविष्य की भू-राजनीति: आगे क्या?
आने वाले समय में पहले से व्याप्त चुनौती के अलावा कईनई चुनौती का सामना भी आवश्यक है जैसे
ai को कैसे समाज के हित हेतु प्रयोग हो
साइबर क्राइम से कैसे निपटा जाए
खुली अर्थव्यवस्था से विश्व बंद अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसारित है इसका अनुपालन कैसे हो
यह सारे प्रश्न भारत के पास है अतः कभारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों मौजूद हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
भू-राजनीति केवल विशेषज्ञों का विषय नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक के लिए आवश्यक समझ है। आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अधिक जटिल होगी, जहाँ भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
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FAQ
प्रश्न क्या भारत एक उभरती शक्ति है?
उतर भारत न बल्कि उभरती शक्ति है यह एक महत्वपूर्ण शक्ति है
प्रश्न भारत भू राजनीत में कान्हा स्थान रखता है?
उत्तर : वर्तमान समय में भारत भू राजनीति की धूरी है जो आने वाली व्यवस्था का नेतृत्व करेगा।
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