चीन डॉलर से दूरी क्यों बना रहा है? इसके पीछे की असली आर्थिक और रणनीतिक वजहें

China vs Dollar – Global Currency Shift Analysis

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चीन डॉलर पर निर्भरता कम कर युआन को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दे रहा है।


क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी तिजोरी से दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा को धीरे-धीरे बाहर क्यों निकाल रही है?

पिछले कुछ वर्षों में, वैश्विक वित्तीय गलियारों में 'डीडॉलराइजेशन' एक चर्चित शब्द बन गया है, और चीन इस बदलाव का केंद्र है।

यह सिर्फ एक संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है जो वैश्विक व्यापार के भविष्य को पूरी तरह बदल सकती है।

चीन न केवल अपने व्यापारिक लेन-देन में अपनी मुद्रा 'युआन' (RMB) को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि डॉलर-आधारित प्रणालियों के विकल्प भी तैयार कर रहा है।

 इस लेख में हम डेटा और अंतरराष्ट्रीय स्रोतों के आधार पर इस जटिल प्रक्रिया के पीछे के असली कारणों का विश्लेषण करेंगे।

डॉलर इतना dominant क्यों है?

अमेरिकी डॉलर दशकों से वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बना हुआ है। इसकी प्रभुसत्ता के तीन मुख्य स्तंभ हैं:

विदेशी मुद्रा भंडार (Reserves), विदेशी मुद्रा व्यापार (FX trading), और सीमा पार भुगतान (Cross-border payments)। आईएमएफ (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक केंद्रीय बैंकों के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी ऐतिहासिक रूप से बहुत अधिक रही है। 

हालांकि इसमें मामूली गिरावट आई है, लेकिन जून 2025 तक यह अभी भी एक मजबूत स्थिति में बनी हुई है। स्रोत

विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की भूमिका और भी अधिक स्पष्ट है। बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के 2022 के त्रैवार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया भर में होने वाले कुल विदेशी मुद्रा व्यापार के 88% हिस्से में अमेरिकी डॉलर एक पक्ष (one side of the transaction) के रूप में मौजूद था। 

यह वैश्विक तरलता में डॉलर की अपरिहार्यता को दर्शाता है। इसके अलावा, स्विफ्ट (SWIFT) संदेश प्रणाली के माध्यम से होने वाले वैश्विक भुगतान में भी डॉलर की हिस्सेदारी लगभग आधी है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग की डिफ़ॉल्ट भाषा बनाती है।

चीन डॉलर से दूरी क्यों चाहता है? (Economic + Strategic Drivers)

चीन की डॉलर से दूरी बनाने की इच्छा के पीछे कई आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं, जिन्हें नीचे विस्तार से समझाया गया है:

1. प्रतिबंध और भू-राजनीतिक जोखिम (Sanctions/Geopolitical risk)

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह से रूस को स्विफ्ट प्रणाली से बाहर किया गया और उसके डॉलर भंडार को फ्रीज किया गया, उसने चीन के लिए एक 'वेक-अप कॉल' का काम किया है। 

डेलोरस सेंटर (Delors Centre) की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अमेरिका 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' के माध्यम से दुनिया भर की कंपनियों को नियंत्रित करने की शक्ति रखता है क्योंकि डॉलर और अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली आपस में बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। 

चीन को डर है कि भविष्य में किसी भी तनाव की स्थिति में उसके 3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकिंग पहुंच को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

स्रोत 

2. व्यापार चालान और निपटान लागत (Trade invoicing & settlement cost)

डॉलर पर निर्भरता का मतलब है कि चीन को अपने अधिकांश व्यापार के लिए मुद्रा विनिमय (currency exchange) की अतिरिक्त लागत चुकानी पड़ती है। 

पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBoC) ने 40 से अधिक विदेशी केंद्रीय बैंकों के साथ 'द्विपक्षीय मुद्रा स्वैप समझौतों' (Bilateral Currency Swap Agreements) पर हस्ताक्षर किए हैं। 

इन समझौतों का उद्देश्य डॉलर की मध्यस्थता के बिना सीधे स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करना है, जिससे विनिमय दर का जोखिम कम होता है और लेन-देन की लागत में बचत होती है। फरवरी 2024 तक, लगभग 4.16 ट्रिलियन युआन मूल्य के समझौते प्रभावी थे।

3. युआन (RMB) के अंतरराष्ट्रीयकरण की रणनीति

चीन सक्रिय रूप से युआन को एक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

स्विफ्ट आरएमबी ट्रैकर (SWIFT RMB Tracker) के अगस्त 2025 के आंकड़ों के अनुसार, युआन अब वैश्विक भुगतान में मूल्य के आधार पर दुनिया की छठी सबसे सक्रिय मुद्रा है। 

हालांकि डॉलर और यूरो की तुलना में इसकी हिस्सेदारी अभी कम (लगभग 2.93%) है, लेकिन इसमें निरंतर वृद्धि देखी जा रही है, खासकर उन गलियारों में जिनमें चीन की मुख्य भूमिका है।

स्रोत 

4. पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर: 

CIPS और mBridgeचीन ने डॉलर-आधारित बैंकिंग प्रणाली के विकल्प के रूप में अपना खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है। 

'क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम' (CIPS) का विकास इसमें सबसे प्रमुख है। FXC Intelligence के विश्लेषण के अनुसार, 2024 में CIPS के माध्यम से होने वाले लेन-देन की मात्रा में 43% की वृद्धि हुई और यह 175.49 ट्रिलियन युआन ($24.45 ट्रिलियन) तक पहुंच गई। 

CIPS अब स्विफ्ट के प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर रहा है, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए जो पश्चिमी प्रतिबंधों से बचना चाहते हैं। 

स्रोत 

साथ ही, 'प्रोजेक्ट mBridge' केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDC) का उपयोग करके सीमा पार भुगतान को तत्काल और सस्ता बनाने की एक नई तकनीक है।

CIPS vs SWIFT Global Payment Network

China CIPS payment system global network alternative to SWIFT
CIPS चीन की वैकल्पिक भुगतान प्रणाली है जो SWIFT के विकल्प के रूप में उभर रही है।


बीआईएस (BIS) की रिपोर्ट बताती है कि mBridge एक साझा लेजर तकनीक पर काम करता है जहां चीन, यूएई, थाईलैंड और हांगकांग के केंद्रीय बैंक सीधे डिजिटल मुद्राओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं। 

यह प्रणाली पारंपरिक कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग मॉडल को बाईपास कर देती है, जिसमें डॉलर की भूमिका अनिवार्य होती थी।

डेटा स्नैपशॉट: चीन का बढ़ता वित्तीय बुनियादी ढांचा

  • CIPS लेन-देन मूल्य (2024): ¥175.49 ट्रिलियन
    Source: FXC Intelligence
  • आरएमबी स्वैप समझौते: 40+ विदेशी केंद्रीय बैंकों के साथ
    Source: China Government Portal
  • वैश्विक भुगतान हिस्सेदारी (RMB): ~2.93%
    Source: SWIFT RMB Tracker
  • mBridge पायलट: $22 मिलियन+ के वास्तविक लेन-देन सफल
    Source: BIS Report

कितनी दूरी?” — एक हकीकत जांच (Reality Check)

चीन की कोशिशों के बावजूद, डॉलर से पूरी तरह नाता तोड़ना फिलहाल असंभव लगता है। आईएमएफ के वर्किंग पेपर (IMF Working Paper 2025) के अनुसार, भले ही युआन की वैश्विक पैठ बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी बहुत छोटे आधार से शुरू हो रही है।

डॉलर का प्रभुत्व केवल परंपरा नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी वित्तीय बाजारों की गहराई, कानूनी पारदर्शिता और डॉलर की पूर्ण परिवर्तनीयता (convertibility) पर आधारित है।

स्रोत 

चीन का युआन अभी भी पूरी तरह परिवर्तनीय नहीं है, जिसका अर्थ है कि निवेशक इसे उतनी आसानी से निकाल या जमा नहीं कर सकते जितनी आसानी से वे डॉलर के साथ कर सकते हैं।

इसके अलावा, वैश्विक ऋणों और कमोडिटी व्यापार (जैसे कच्चा तेल) का निपटान अभी भी मुख्य रूप से डॉलर में ही होता है। स्विफ्ट के डेटा से पता चलता है कि जहां डॉलर की हिस्सेदारी लगभग 47% है, वहीं युआन अभी भी 3% के आसपास संघर्ष कर रहा है।

स्रोत 

Dollar vs Yuan: चीन की सीमाएँ

Dollar vs Yuan: चीन की सीमाएँ (Quick Snapshot)

पहलू वास्तविकता
पूंजी नियंत्रण युआन पूरी तरह मुक्त (fully convertible) नहीं; पूंजी नियंत्रण लागू हैं
भरोसा डॉलर की तुलना में वैश्विक विश्वास कम माना जाता है
बाज़ार की गहराई चीन के वित्तीय/पूंजी बाज़ार अपेक्षाकृत सीमित और कम तरल (liquid) हैं
वैश्विक स्वीकार्यता युआन का उपयोग अभी मुख्यतः क्षेत्रीय और चुनिंदा द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित है

Note: यह “सीमाएँ” युआन के अंतरराष्ट्रीयकरण की रफ्तार को धीमा करती हैं, इसलिए डॉलर का प्रभुत्व अल्पकाल में बरकरार रह सकता है।

Dollar vs Yuan – Market Depth Comparison

Dollar vs Yuan global currency comparison market depth and trust
डॉलर अभी भी वैश्विक बाज़ार की गहराई और विश्वास में आगे है, जबकि युआन तेजी से उभर रहा है।


युआन को आगे बढ़ाने की चीन की रणनीति

1) युआन में व्यापार इनवॉइसिंग

चीन कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा/युआन में व्यापार को बढ़ावा दे रहा है, ताकि भुगतान में डॉलर निर्भरता कम हो और विनिमय दर जोखिम (FX risk) सीमित रहे।

2) CIPS Payment System

SWIFT के विकल्प के रूप में चीन ने CIPS विकसित किया है, जिससे युआन-आधारित अंतरराष्ट्रीय भुगतान और क्लियरिंग प्रक्रिया आसान हो जाती है।

3) डिजिटल युआन (e-CNY)

चीन डिजिटल करेंसी (e-CNY) के जरिए भविष्य में सीमा-पार भुगतान को तेज़, सस्ता और अधिक नियंत्रित बनाना चाहता है—खासकर डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में बढ़त के लिए।

डॉलर से दूरी बनाने में भारत की क्या भूमिका है?

भारत रूस और यूएई जैसे कुछ देशों के साथ रुपये में व्यापार निपटाने के लिए विशेष 'वोस्ट्रो खाते' (Vostro Accounts) खोल रहा है, जो वैश्विक मुद्रा विविधीकरण का एक हिस्सा है।

चीन अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है। इसके पीछे के रणनीतिक और आर्थिक कारणों को विशेषज्ञों की रिपोर्ट और डेटा के साथ विस्तार से समझें।

भारत के लिए क्या मतलब? (Opportunities + Risks)

चीन की डॉलर से दूरी बनाने की कोशिशें भारत के लिए एक जटिल चुनौती और अवसर दोनों पेश करती हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी हाल के वर्षों में 'रुपये केअंतरराष्ट्रीयकरण' की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

1.अवसर:

यदि दुनिया बहु-ध्रुवीय मुद्रा प्रणाली (multi-polar currency system) की ओर बढ़ती है, तो भारत के पास यूएई जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने के अधिक विकल्प होंगे। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो सकता है।

2. जोखिम:

चीन द्वारा समर्थित CIPS और mBridge जैसी प्रणालियाँ चीन के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं। यदि भविष्य में वैश्विक व्यापार इन प्रणालियों पर शिफ्ट होता है, तो भारत को अपनी वित्तीय स्वायत्तता और इन नेटवर्क में भागीदारी के बीच संतुलन बनाना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को सीधे चीन की डीडॉलराइजेशन मुहिम का हिस्सा बनने के बजाय, अपनी खुद की 'डिजिटल रुपया' (e-Rupee) और 'यूपीआई' (UPI) जैसी प्रणालियों के वैश्विक विस्तार पर ध्यान देना चाहिए ताकि वह डॉलर के प्रभुत्व और चीन की बढ़ती वित्तीय शक्ति के बीच एक स्वतंत्र स्थान बना सके।

डेटा स्नैपशॉट: वैश्विक मुद्रा परिदृश्य 2024-25

  • डॉलर का FX व्यापार हिस्सा: लगभग 88%
    Source: BIS Triennial Survey
  • विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर: लगभग 58–60%
    Source: IMF Reserve Data
  • CIPS प्रतिभागियों की संख्या: मई 2025 तक 1,683 संस्थाएं
    Source: FXC Intelligence Report

Myth vs Fact (मिथक बनाम वास्तविकता)

Myth vs Fact: डॉलर बनाम युआन और डीडॉलराइजेशन

मिथक वास्तविकता
मिथक 1: डॉलर जल्द ही बेकार हो जाएगा। तथ्य: डॉलर अभी भी वैश्विक मुद्रा भंडार और व्यापार में प्रमुख हिस्सा रखता है; इसका पतन अचानक नहीं होगा।
Source: IMF
मिथक 2: युआन तुरंत डॉलर को रिप्लेस कर देगा। तथ्य: सीमित परिवर्तनीयता और कड़े पूंजी नियंत्रण इसकी वैश्विक विस्तार में बाधा हैं।
Source: IMF WP
मिथक 3: SWIFT के बिना अंतरराष्ट्रीय व्यापार संभव नहीं। तथ्य: CIPS और mBridge जैसे विकल्प वास्तविक लेन-देन में उपयोग हो रहे हैं।
Source: BIS
मिथक 4: डीडॉलराइजेशन केवल राजनीति है। तथ्य: स्थानीय मुद्रा में व्यापार से विनिमय दर जोखिम कम होता है और शुल्क बच सकता है।
Source: PBoC
मिथक 5: भारत को इससे कोई मतलब नहीं। तथ्य: भारत भी रुपये में अंतरराष्ट्रीय भुगतान के विकल्पों पर काम कर रहा है।
मिथक 6: CBDC केवल प्रयोग हैं। तथ्य: mBridge पायलट ने cross-border भुगतान की गति और लागत में सुधार दिखाया है।
Source: BIS mBridge


निष्कर्ष 

चीन का डॉलर से दूरी बनाना केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संप्रभुता को सुरक्षित करने की एक दीर्घकालिक योजना है।

Key Takeaways:

चीन 'वेपनीकरण ऑफ डॉलर' (प्रतिबंधों के जोखिम) से बचने के लिए अपनी वित्तीय प्रणाली बना रहा है।

CIPS और मुद्रा स्वैप समझौतों के माध्यम से युआन का वैश्विक उपयोग बढ़ रहा है।

डिजिटल मुद्रा प्रोजेक्ट जैसे mBridge डॉलर-आधारित बैंकिंग के लिए एक गंभीर तकनीकी चुनौती पेश कर रहे हैं।

डॉलर का प्रभुत्व अभी भी बना हुआ है, लेकिन इसमें दरारें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं।

भारत जैसे देशों के लिए यह अपनी मुद्रा और भुगतान प्रणालियों को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का समय है।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q 1. 

डीडॉलराइजेशन (De-dollarization) क्या है?

A .

यह एक प्रक्रिया है जिसमें कोई देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकिंग लेन-देन के लिए अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को कम करने की कोशिश करता है।

Q 2

चीन का CIPS क्या है और यह स्विफ्ट से कैसे अलग है?

A .

CIPS (Cross-border Interbank Payment System) चीन की अपनी भुगतान निपटान प्रणाली है। स्विफ्ट केवल एक संदेश प्रणाली है, जबकि CIPS निपटान (settlement) और संदेश दोनों का काम करता है, विशेष रूप से युआन के लिए। [Source: FXC Intelligence]

Q3

क्या युआन पूरी दुनिया की मुद्रा बन सकता है?

फिलहाल नहीं। युआन का उपयोग बढ़ने के लिए चीन को अपने पूंजी नियंत्रणों को ढीला करना होगा और अपनी वित्तीय प्रणाली में दुनिया का भरोसा बढ़ाना होगा।

Q4

प्रोजेक्ट mBridge क्या है?

यह चीन, यूएई, थाईलैंड और हांगकांग के केंद्रीय बैंकों की एक पहल है, जो ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग करके सीधे डिजिटल मुद्राओं (CBDC) में सीमा पार व्यापार करने की अनुमति देती है। [Source: BIS]

Q5

अमेरिकी प्रतिबंध चीन को कैसे प्रभावित करते हैं?

चूंकि अधिकांश वैश्विक व्यापार डॉलर में होता है, अमेरिका किसी भी चीनी बैंक को डॉलर तक पहुंच से रोककर उसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार से काट सकता है। डीडॉलराइजेशन इसी जोखिम को कम करता है। [Source: Delors Centre]

पाठकों से सवाल:

1. क्या आपको लगता है कि अगले 10 वर्षों में युआन डॉलर के बराबर खड़ा हो पाएगा?

2. क्या भारत को अपनी 'डिजिटल रुपया' प्रणाली को चीन के mBridge के साथ जोड़ना चाहिए या अपना अलग वैश्विक नेटवर्क बनाना चाहिए?कॉमेंट में उत्तर अवश्य दें ।

लेखक 

प्रभु नाथ 

एक स्वतंत्र विश्लेषक 

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