पिछले 2से 3 साल के वैश्विक घटनाओं का विश्लेषण करें तो हम पातें है की पुरानी वैश्विक व्यवस्था चरमरा रही है उसकी पहचान धुंधली पड़ती जा रही उसकीजगह नई व्यवस्था के आगमन की आहट सुनाई दे रही है। पिछले कुछ दशकों में हमने जिस 'स्थिर' विश्व की कल्पना की थी, वह अब तेजी से धुंधली पड़ती जा रही है। रूस-यूक्रेन के बीच संघर्ष, मध्य पूर्व में बढ़ती सैन्य गतिविधियां और दक्षिण चीन सागर में हथियारों की होड़—ये सब इस बात का संकेत हैं कि वैश्विक स्थिरता में पुरानी ताकत की शक्ति घट रही है साथ ही नई शक्तियों का उदय भी हो रहा है।
हाल ही में जारी हुई 'विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026' ने भी इस खतरे की तरफ स्पष्ट संकेतन किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, 'भू-आर्थिक टकराव' (Geoeconomic Confrontation) इस साल दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। लेकिन क्या यह केवल सीमाओं का विवाद है, या इसके पीछे कुछ गहरे कारण छिपे हैं? आइए, एक स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषण के जरिए इसे समझते हैं।
1. शक्ति का केंद्र बदल रहा है: बहुध्रुवीय विश्व की ओर (A Shifting Power Balance)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से दुनिया काफी हद तक अमेरिका और उसके सहयोगियों के इर्द-गिर्द घूमती थी। अमरीक और यूरोपीय देश मिलकर ही वैश्विक अर्थव्यवस्था का संचालन किया करते थे। वैश्विक आर्थिक संस्थान भी इन्हीं देशों के हाथों में था तथा इनका संचालन इनके आदेशों और शर्तों पर होते थे।लेकिन 2020 जब करना का दौर था से 2026 तक आते-आते यह 'एकध्रुवीय' व्यवस्था खत्म हो चुकी है। अब चीन, भारत 'ग्लोबल साउथ' के देशों के साथ अपनी शर्तों और नियमों पर विश्व मंच पर भूमिका का दावा कर रहे हैं।
पुराने पश्चिमी सैन्य गठबंधनों में दरार ,नाटो (NATO) जैसे संगठनों के भीतर आंतरिक मतभेद और व्यापारिक हितों को लेकर पश्चिमी देशों के बीच बढ़ती खींचतान ने नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। ट्रांजेक्शनल डिप्लोमेसी (Transactional Diplomacy) के दौर में अब देश सिद्धांतों के बजाय तात्कालिक फायदों को तवज्जो दे रहे हैं।
ग्लोबल साउथ की उभरती आवाज
भारत जैसे देश अब केवल आदेशों को बिना शर्त पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि एक दूसरे के सहभागिता तथा न्याय संगत व्यवस्था के पक्षधर की भूमिका में आ चुके हैं।। विकासशील देश अब पश्चिमी प्रतिबंधों या नीतियों को आंख मूंदकर स्वीकार करने के पक्ष में बिलकुल नहीं है । वे एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहाँ उनकी संप्रभुता और आर्थिक हितों का सम्मान हो।
2. 2026 के तीन सबसे बड़े भू-राजनीतिक जोखिम
वर्तमान परिस्थितियों का गहराई से विश्लेषण करने पर तीन प्रमुख मोर्चे उभरकर सामने आते हैं जो वैश्विक स्थिरता को हिला रहे हैं:
क. आर्थिक युद्ध और ट्रेड टैरिफ (Economic Warfare)
अब युद्ध केवल गोलियों से नहीं, बल्कि व्यापारिक प्रतिबंधों और टैरिफ से भी लड़े जा रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच जारी 'चिप वॉर' और सप्लाई चेन को अपने कब्जे में लेने की होड़ ने वैश्विक बाजार को दो हिस्सों में बांट दिया है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है, क्योंकि इससे दुनिया भर में महंगाई (Inflation) बढ़ रही है।
ख. हाइब्रिड वॉरफेयर और साइबर सुरक्षा (Hybrid Warfare)
2026 में युद्ध के मैदान बदल गए हैं। अब दुश्मन देश की सेना पर हमला करने से पहले उसके पावर ग्रिड, बैंकिंग सिस्टम और संचार व्यवस्था को 'साइबर अटैक' के जरिए ठप करने की कोशिश की जाती है। भारत जैसे देशों के लिए साइबर सुरक्षा इस साल सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
ग. संसाधनों का संकट:
पानी और ऊर्जा की जंग जलवायु परिवर्तन ने संसाधनों की कमी को युद्ध का नया कारण बना दिया है। मध्य एशिया में नदियों के पानी को लेकर विवाद हो या आर्कटिक क्षेत्र में तेल और गैस पर कब्जे की होड़, भविष्य के संघर्ष 'प्राकृतिक संसाधनों' पर नियंत्रण पाने के लिए होंगे।
3. तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सैन्यीकरण
विश्व व्यवस्था में अस्थिरता का एक बड़ा कारण तकनीक की बेतहाशा दौड़ भी है। 2026 में सैन्य रणनीति अब पूरी तरह से AI और स्वायत्त हथियारों (Autonomous Weapons) पर निर्भर होती जा रही है।
ड्रोन युद्ध:
यूक्रेन और मध्य पूर्व के संघर्षों ने दिखा दिया है कि सस्ते ड्रोन भी करोड़ों के टैंकों को तबाह कर सकते हैं।
अंतरिक्ष का सैन्यीकरण: अब होड़ सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। उपग्रहों को मार गिराने वाली तकनीक और अंतरिक्ष में अपने ठिकाने बनाना वैश्विक शक्तियों की प्राथमिकता बन गया है।
4. क्या बहुपक्षीय संस्थाएं विफल हो रही हैं? (Weakening of Multilateralism)
संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसी संस्थाएं, जिन्हें शांति और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाया गया था, आज के समय में बेअसर नजर आ रही हैं। जब वीटो पावर रखने वाले देश ही संघर्षों में शामिल हों, तो समाधान की उम्मीद कम हो जाती है। इसी कारण अब 'G20' या 'BRICS' जैसे क्षेत्रीय समूहों का महत्व बढ़ रहा है, जहाँ देश अपने हितों को सुरक्षित देख रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे संगठन का निर्माण ही द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात पश्चिम देशों के शक्तियों को स्थापित करने के लिए हवा था। अगर इनके siqurty काउंसिल के सदस्यों को देखें तो ज्यादातर देश पश्चिम है। आज के सन्दर्भ मे इन देशों से कई एशियाई देस आर्थिक मोर्चा से लेकर सैन्य मोर्चे तक में कहीं आगे है। अतः un में बदलाव बहुत जरूरी हो गया है।या तो बदलाव होगा या इन संस्थानों का महत्व घट जाएगा गा और बहुध्रुवीय इस आने वाली व्यवस्था में कोई अन्य संस्थान इसकी जगह लेलेंगे।
निष्कर्ष:
क्या है शांति का रास्ता?
2026 की यह अस्थिरता केवल एक दौर नहीं, बल्कि एक नए युग की आहट है। दुनिया एक ऐसी व्यवस्था की तलाश में है जहाँ शक्ति का संतुलन हो। इतिहास गवाह है कि जब भी वैश्विक व्यवस्था बदली है, तनाव बढ़ा है। लेकिन आज की परमाणु संपन्न दुनिया में पूर्ण युद्ध किसी के हित में नहीं है। समाधान केवल 'संवाद' और 'आर्थिक एकीकरण' में ही छिपा है।
जनता की राय:
एक जागरूक नागरिक के रूप में आपको क्या लगता है? क्या संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को आज के दौर के हिसाब से खुद को बदलने की जरूरत है, या हमें एक पूरी तरह नई वैश्विक संस्था की आवश्यकता है जो छोटे और बड़े देशों को समान नजर से देख सके?
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