रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ
रणनीतिक स्वायत्तता का सीधा मतलब है—अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अकेला
रहना चाहता है या किसी से सहयोग नहीं करेगा, बल्कि यह कि वह किसी भी देश या गुट के दबाव में आकर फैसले नहीं करेगा।
उदाहरण के तौर पर, भारत अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीक में सहयोग करता है, लेकिन रूस से तेल खरीदने का फैसला भी अपने हित में लेता है।
इसी तरह, चीन के साथ सीमा विवाद होने के बावजूद भारत संवाद के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करता। यही संतुलन रणनीतिक स्वायत्तता की पहचान है।
गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता तक
आज की नीति को समझने के लिए इतिहास में जाना ज़रूरी है। शीत युद्ध के दौर में दुनिया दो गुटों—अमेरिका और सोवियत संघ—में बंटी थी।
उस समय भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non Aligned Movement) का रास्ता चुना। इसका उद्देश्य था किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा न बनना।
लेकिन समय के साथ दुनिया बदल गई। शीत युद्ध खत्म हुआ, नए आर्थिक और तकनीकी संघर्ष उभरे। ऐसे में केवल “गुटनिरपेक्ष” रहना पर्याप्त नहीं था।
भारत ने अपनी नीति को अपडेट किया और रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा सामने आई। इसमें सहयोग भी है और आत्मनिर्भरता भी।
(non aligned policy India → strategic autonomy India)
भारत के लिए यह नीति क्यों जरूरी है?
भारत की भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति उसे मजबूर करती है कि वह संतुलन बनाए रखे। भारत एक विकासशील देश है, जिसकी ऊर्जा ज़रूरतें, रक्षा आवश्यकताएँ और आर्थिक लक्ष्य बहुत बड़े हैं।
भारत को सस्ता तेल चाहिए, इसलिए वह रूस और मध्य पूर्व से रिश्ते बनाए रखता है।
तकनीक और निवेश के लिए अमेरिका और यूरोप ज़रूरी हैं।
पड़ोसी देश और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एशिया में सक्रिय भूमिका जरूरी है।
अगर भारत किसी एक गुट में पूरी तरह चला जाए, तो उसके बाकी हित प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए रणनीतिक स्वायत्तता भारत की मजबूरी भी है और ताकत भी।
अमेरिका, रूस और चीन के बीच संतुलन
रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा तब होती है, जब बड़े देशों के बीच टकराव हो। आज सबसे बड़ा उदाहरण है अमेरिका-चीन टकराव। अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति में अहम साझेदार मानता है, वहीं चीन भारत का पड़ोसी और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है।
दूसरी तरफ रूस दशकों से भारत का रक्षा साझेदार रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपने हितों को देखते हुए संतुलित रुख अपनाया।
यह नीति बताती है कि भारत किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने लिए फैसले करता है। यही रणनीतिक स्वायत्तता का व्यवहारिक रूप है।
रणनीतिक स्वायत्तता की चुनौतियाँ
यह नीति जितनी आकर्षक लगती है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है। कुछ बड़ी चुनौतियाँ हैं:
दबाव की राजनीति – बड़े देश भारत से खुलकर पक्ष लेने की उम्मीद करते हैं।
आर्थिक निर्भरता – तकनीक, निवेश और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता अभी पूरी नहीं है।
सीमित संसाधन – भारत को हर मोर्चे पर एक साथ मजबूत होना पड़ता है।
इन चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं, लेकिन भारत लगातार इसी दिशा में प्रयास कर रहा है।
बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका
आज दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) बन रही है। केवल एक या दो शक्तियाँ नहीं, बल्कि कई देश मिलकर वैश्विक दिशा तय कर रहे हैं। ऐसे समय में भारत खुद को Global South की आवाज़ के रूप में पेश कर रहा है।
G20 की अध्यक्षता, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भूमिका और आर्थिक कूटनीति—ये सब भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करते हैं। भारत न तो टकराव चाहता है, न ही अधीनता। वह सहयोग, संवाद और संतुलन का रास्ता अपनाता है।
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य साफ़ है—राष्ट्रीय हित, स्वतंत्र निर्णय और संतुलित कूटनीति। रणनीतिक स्वायत्तता भारत को यह आज़ादी देती है कि वह बदलती वैश्विक राजनीति में अपने लिए सही रास्ता चुने। यही कारण है कि भारत आज केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।
आप क्या सोचते हैं?
आपके अनुसार भारत को आने वाले समय में किस देश या समूह के साथ सबसे ज़्यादा नज़दीकी बढ़ानी चाहिए, या यही संतुलन बनाए रखना चाहिए।

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