यूजीसी क्या है
यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन अर्थात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, विश्वविद्यालयों के विकास, शिक्षाप्रणाली, को निर्देशित और सुदृढ़ करने वाला एक प्रमुख स्वायत्त संस्थान है ठीक NCERT जैसा।
1944 सार्जेंट रिपोर्ट से शुरू हुआ सिलसिला 1956 में यूजीसी नामक संस्था के जन्म का कारण बना। अर्थात UGC का स्थापना 1956 में हुआ परंतु इसकी शुरुआत 1944 में ही हो चुकी थी।
यूजीसी का मुख्य कार्यालय न्यूदिल्ली में है। इसमें एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और केंद्र सरकार द्वारा भेजा गया एक सदस्य भी होता हैं।
इस संस्थान का प्रमुख कार्य विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम निर्धारण, विश्वविद्यालय को मान्यता प्रदान करना, शिक्षा के साधनों का विस्तार जैसी ऑनलाइन शिक्षा आदि पर नज़र रखना आदि है।
नई गाईड लाइन जिस पर विवाद है
13 जनवरी 1926 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा एक नया एक्ट पारित किया गया जिसका नामकरण “समता के संवर्धन से संबंधित विनियम 2026 है।
इस नियम के अनुसार विश्वविद्यालय में st कॉस्ट sc कॉस्ट तथा ओबीसी कास्ट के व्यक्ति पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को अपराध के श्रेणी में आता है। यह नियम सभी प्रकार के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय पर लागू होता है।
क्या है कारण? कहीं ये राजनीतिक प्रयोग तो नहीं?
यह सही है की विश्वविद्यालयों में छिटपुट घटनाएं हुई, जिसको जातीय रंग दिया गया है। यह भी माना जा सकता है की कुछ जगह हो पर रियाल घटनाएं भी हुई होगी।
परंतु इन छोटी छोटी घटनाओं को बढ़ाकर एक वर्ग को शोषक और एक वर्ग को शोषित घोषित करना और वो भी वैधानिक रूप में इस बात को इंगित करता है की इसमें राजनीतिक हाथ है।
चुकी केंद्र सरकार स्वतंत्रता के पहले के हर प्रतीक को मिटाना चाहती है अतः यूजीसी को भी एक दिन अन्य नई संस्था जिसमे भारतीयता का पुट हो के रूप में प्रविवृत करना था।
प्रतीत होता है की संस्थान में किसी सरकार विरोधी विचारधारा के व्यक्ति को इस बात का भनक हो और जाते जाते सरकार को कटघरे में खड़ा करने के उद्देश्य से यह किया गया हो। नोट यह मेरा व्यक्तिगत विश्लेषण है तथ्य नहीं।
यूजीसी का भविष्य क्या है?
यह विश्लेषण नहीं बल्कि दावा है की सारी प्रमुख शैक्षिक संस्थाओं जो स्वतंत्रता से पहले की है समाप्त किया जाएगा या विलय किय जाएगा।
इसका तथ्य सरकार द्वारा भूतकाल में लिया गया निर्णय है। नई संसद का निर्माण, राम मंदिर का निर्माण, भारतीय न्याय संहिता का निर्माण इस ओर साफ साफ इंगित करता है।
साथ ही पुरानी संस्थाओं में जमा हो गए सरकार विरोधी तत्व के क्रिया कलाप भी सरकार को मजबूर करता है ऐसी निर्णय लेने हेतु। अभी हो सकता है की फौरी तौर पर इस नियम का कुछ संशोधन हो परंतु यह दीर्घ कालीन नहीं होगा।
निष्कर्ष
सरकार द्वारा सभी परतंत्रता के प्रतीक मिटने है उसमें इस संस्थान में बदलाव भी निश्चित है।
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लेखक
प्रभु नाथ

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